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परिंदे हम उन्मुक्त

भूल बैठे अपनी उड़ान हैं

एक लम्हा गम का आया

भुला दी अपनी मुस्कान है

 

जरा देखो अपने अंतर्मन मैं

क्या तुम्हारी पहचान है

कहो प्रफुल्लित हो गया मन अब

मिट गयी सारी थकान है

परिंदे हम उन्मुक्त

भूल बैठे अपनी उड़ान हैं

 

नापने निकले अगर हम

छोटा  ये आसमान है

नया  नया लग रहा आज

सजीवन ये जहान है

 

गिर के उठ सके फिर से

इस धरा पर वही मनुष्य महान है

कहाँ भटकते घूम रहे हो

तुम मैं ही सब निदान है

 

परिंदे हम उन्मुक्त

भूल बैठे अपनी उड़ान हैं

 

सत्य पथ पर  बढ़  तू आगे

सखा तेरा ज्ञान है

ज्ञान और सच्च इरादे है अगर

हर राह आसान है

बादशाहत खुद की भूला

याद रख तू सुल्तान है