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सिर्फ़ होसले बुलंद है, न कोई प्रबंध है
अपनी राह पर स्ंकल्प की मशाल ले
चल तू अनवरत ,अनवरत ,अनवरत
अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ !

चलते चलते तू गिरेगा भी कभी
प्रण कर तू न .कभी डिगेगा कभी
ठोकरों से टकरा कर मेरे लाल
डर मत ! डर मत ! डर मत !
अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ !

आत्मा अनंत है ,सदैव ही जीवंत है
नीर से न भीगती ,वायु से ना सूखती
अग्नि की जलाने वाली है क्या
कोई लपट !कोई लपट !कोई लपट
अग्निपथ ! अग्निपथ ! अग्निपथ !

 

 

श्री हरिवंश राय बच्चन जी को सादर समर्पित यह कविता, एक प्रयास कुछ और पंकितया जोड़ने का

आपका शुभचिंतक
विवेक जैन