: “कितनी मासुम सी ख़्वाहिश थी इस नादांन दिल की,
जो चाहता था कि..
शादी भी करूँ और 👪….
ख़ुश भी रहूँ “..

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: कैसे मुमकिन था किसी और दवा से इलाज
“ग़ालिब”
इश्क़ का रोग था, बाप की चप्पल से ही आराम आया…

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