साँपों के मुकद्दर में
वो ज़हर कहाँ ।
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जो इंसान आजकल सिर्फ ,
बातों में ही उगल देता है …

किसीने खूब कहा है।

न मेरा एक होगा , न तेरा लाख होगा,
न तारिफ तेरी ,न मेरा मजाक होगा,
गुरुर न कर शाह-ए-शरीर का,…
मेरा भी खाक होगा ,
तेरा भी खाक  होगा …!

ए बुरे वक़्त !
ज़रा अदब से पेश आ !!
वक़्त ही कितना लगता है
वक़्त बदलने में !!

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