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रिश्तो की डोर कमजोर तब होती है
जब इंसान गलत फहमी मे
पैदा होने वाले सवालों का जवाब भी खुद
ही बना लेता है !!!!
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छोड़ तो सकता हूँ मगर छोड़ नहीं पाता उसे,
वो शख्स मेरी बिगड़ी हुई आदत की तरह है..
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खाने को ग़म, पीने को आंसू, बिछाने को चाहें, ढकने
को आहें ..
शायर की झोपडी में किस चीज़ की कमी है ?
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उसे तोडना आता है …इसलिए उसने तोड़
दिया …..! वो जानता ही नहीं कि दिल
की एहमियत क्या है….!!”
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गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तेफ़ाक़ से,, पूंछेंगे
अपना हाल तेरी बेबसी से हम..!!
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कोई नामुमकिन सी बात मुमकिन करके दिखा.
खुद पहचान लेगा जमाना तुझे….. तू भीड़ में भी अलग चल
कर दिखा
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है कोई वकील इस जहान में…..जो हारा हुआ इश्क
जीता दे मुझको…..?
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ये शहर जालिमो का है संभल के
चलना दोस्तों… लोग सीने से लगा कर ‘दिल’
ही निकाल लेते है…!!
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बहकते हुए फिरतें हैं कई लफ्ज़ जो दिल में.
दुनिया ने दिया वक़्त तो लिखेंगे
किसी रोज़..

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लो गुज़र गया यह दिन भी,
अपनी तमाम रौनके ले कर…

_अगर ज़िन्दगी ने वफ़ा की;
तो कल फिर सिलसिले होंगे…!!!
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Source : unknown