Tags

,

जैन तीर्थंकरों का परिचय :
जैन धर्म के 24 तीर्थंकर है। इसमें से प्रथम
तथा अंतिम चार तीर्थंकरों के बारे में बहुत
कुछ पढ़ने को मिलता है किंतु उक्त के बीच के
तीर्थंकरों के बारे में कम
ही जानकारी मिलती हैं। निश्चित
ही जैन
शास्त्रों में इनके बारे में बहुत कुछ
लिखा होगा, लेकिन आम जनता उनके बारे
में कम ही जानती है।
यहाँ प्रस्तुत है 24 तीर्थंकरों का सामान्य
परिचय।
(1) आदिनाथ : प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ
को ऋषभनाथ भी कहा जाता है और हिंदू
इन्हें वृषभनाथ कहते हैं। आपके पिता का नाम
राजा नाभिराज था और माता का नाम
मरुदेवी था। आपका जन्म चैत्र कृष्ण पक्ष
की अष्टमी-नवमी को अयोध्या में हुआ।
चैत्र
माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की अष्टमी के दिन आपको कैवल्य
की प्राप्ती हुई। कैलाश पर्वत क्षेत्र के
अष्टपद में आपको माघ कृष्ण-14 को निर्वाण
प्राप्त हुआ।
जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न- बैल, चैत्यवृक्ष- न्यग्रोध, यक्ष-
गोवदनल,यक्षिणी-चक्रेश्वरी हैं।
(2) अजीतनाथजी : द्वितीय तीर्थंकर
अजीतनाथजी की माता का नाम
विजया और पिता का नाम जितशत्रु था।
आपका जन्म माघ शुक्ल पक्ष
की दशमी को अयोध्या में हुआ था। माघ
शुक्ल पक्ष की नवमी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा पौष शुक्ल पक्ष
की एकादशी को आपको कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल
की पंचमी को आपको सम्मेद शिखर पर
निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
उनका प्रतीक चिह्न- गज, चैत्यवृक्ष-
सप्तपर्ण,यक्ष- महायक्ष, यक्षिणी-
रोहिणी है।
(3) सम्भवनाथजी : तृतीय तीर्थंकर
सम्भवनाथजी की माता का नाम
सुसेना और पिता का नाम जितारी है।
सम्भवनाथजी का जन्म मार्गशीर्ष
की चतुर्दशी को श्रावस्ती में हुआ था।
मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के
दिन आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कठोर
तपस्या के बाद कार्तिक कृष्ण
की पंचमी को आपको कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल पक्ष
की पंचमी को सम्मेद शिखर पर
आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक
चिह्न- अश्व, चैत्यवृक्ष- शाल,
यक्ष- त्रिमुख, यक्षिणी- प्रज्ञप्ति।
(4) अभिनंदनजी : चतुर्थ तीर्थंकर
अभिनंदनजी की माता का नाम
सिद्धार्था देवी और पिता का नाम सन्वर
(सम्वर या संवरा राज) है। आपका जन्म माघ
शुक्ल की बारस को अयोध्या में हुआ। माघ
शुक्ल
की बारस को ही आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा कठोर तप के बाद पौष शुक्ल पक्ष
की चतुर्दशी को आपको कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई। बैशाख शुक्ल
की छटमी या सप्तमी के दिन सम्मेद शिखर
पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक
चिह्न-बंदर, चैत्यवृक्ष- सरल, यक्ष- यक्षेश्वर,
यक्षिणी-व्रजश्रृंखला है।
(5) सुमतिनाथजी : पाँचवें तीर्थंकर
सुमतिनाथजी के पिता का नाम मेघरथ
या मेघप्रभ तथा माता का नाम
सुमंगला था।बैशाख शुक्ल
की अष्टमी को साकेतपुरी (अयोध्या) में
आपका जन्म हुआ। कुछ विद्वानों अनुसार
आपका जन्म चैत्र शुक्ल की एकादशी को हुआ
था। बैशाख शुक्ल की नवमी के दिन आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष
की एकादशी को आपको कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल
की एकादशी को सम्मेद शिखर पर
आपको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक
चिह्न- चकवा, चैत्यवृक्ष- प्रियंगु, यक्ष-
तुम्बुरव,यक्षिणी- वज्रांकुशा है।
(6) पद्ममप्रभुजी : छठवें तीर्थंकर
पद्मप्रभुजी के पिता का नाम धरण राज और
माता का नाम सुसीमा देवी था।
कार्तिक कृष्ण पक्ष
की द्वादशी को आपका जन्म वत्स
कौशाम्बी में हुआ। कार्तिक कृष्ण पक्ष
की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के
दिन आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।
फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की चतुर्दशी को आपको सम्मेद शिखर
पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक
चिह्न-कमल, चैत्यवृक्ष- प्रियंगु, यक्ष-मातंग,
यक्षिणी-अप्रति चक्रेश्वरी है।
(7) सुपार्श्वनाथ : सातवें तीर्थंकर
सुपार्श्वनाथ के पिता का नाम प्रतिस्थसेन
तथा माता का नाम पृथ्वी देवी था।
आपका जन्म वाराणसी में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष
की बारस को हुआ था। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष
अंकी त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की सप्तमि आपको कैवल्य ज्ञान प्राप्त
हुआ।फाल्गुन कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन
आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ।
जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-स्वस्तिक,चैत्यवृक्ष- शिरीष, यक्ष-
विजय, यक्षिणी- पुरुषदत्ता है।
(8) चंद्रप्रभु : आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु के
पिता का नाम राजा महासेन
तथा माता का नाम सुलक्षणा था।
आपका जन्म पौष कृष्ण पक्ष की बारस के
दिन चंद्रपुरी में हुआ। पौष कृष्ण पक्ष
की त्रयोदशी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष सात
को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ती हुई।
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष
की सप्तमी को आपको सम्मेद शिखर पर
निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-अर्द्धचंद्र, चैत्यवृक्ष- नागवृक्ष, यक्ष-
अजित,यक्षिणी- मनोवेगा है।
(9) सुविधिनाथ : नवें तीर्थंकर पुष्पदंत
को सुविधिनाथ भी कहा जाता है। आपके
पिता का नाम राजा सुग्रीव राज
तथा माता का नाम रमा रानी था,
जो इक्ष्वाकू वंश से थी। मार्गशीर्ष के कृष्ण
पक्ष की पंचमी को काकांदी में
आपका जन्म हुआ।मार्गशीर्ष के कष्णपक्ष
की छट (6) को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा कार्तिक कृष्ण पक्ष
की तृतीय (3) को आपको सम्मेद शिखर में
कैवल्य की प्राप्ती हुई। भाद्र के शुक्ल पक्ष
की नवमी को आपको सम्मेद शिखर पर
निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न- मकर, चैत्यवृक्ष- अक्ष (बहेड़ा), यक्ष-
ब्रह्मा, यक्षिणी- काली है।
(10) शीतलनाथ : दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ
के पिता का नाम दृढ़रथ (Dridharatha) और
माता का नाम सुनंदा था। आपका जन्म
माघ
कृष्ण पक्ष की द्वादशी (12) को बद्धिलपुर
(Baddhilpur) में हुआ। मघा कृष्ण पक्ष
की द्वादशी को आपने
दीक्षा ग्रहणकी तथा पौष कृष्ण पक्ष
की चतुर्दशी (14)को आपको कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ती हुई।बैशाख के कृष्ण पक्ष की दूज
को आपको सम्मेद
शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-कल्पतरु, चैत्यवृक्ष- धूलि (मालिवृक्ष),
यक्ष-ब्रह्मेश्वर, यक्षिणी-
ज्वालामालिनी है।
(11) श्रेयांसनाथजी : ग्यारहवें तीर्थंकर
श्रेयांसनाथजी की माता का नाम
विष्णुश्री या वेणुश्री था और
पिता का नाम विष्णुराज।
सिंहपुरी नामक स्थान पर फागुन कृष्ण पक्ष
की ग्यारस को आपका जन्म हुआ।श्रावण
शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को सम्मेद शिखर
(शिखरजी) पर आपको निर्वाण प्राप्त हुआ।
जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक
चिह्न-गेंडा, चैत्यवृक्ष- पलाश, यक्ष- कुमार,
यक्षिणी-महाकालीहै।
(12) वसुपूज्य : बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य प्रभु
के पिता का नाम वसुपूज्य (Vasupujya) और
माता का नाम विजया था। आपका जन्म
फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी
को चंपापुरी में हुआ था। फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की अमावस्या को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा मघा की दूज (2) को कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ती हुई। आषाड़ के शुक्ल पक्ष
की चतुर्दशी को चंपा में आपको निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
आपका प्रतीक चिह्न- भैंसा, चैत्यवृक्ष- तेंदू,
यक्ष-
षणमुख, यक्षिणी- गौरी है।
(13) विमलनाथ : तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ
के पिता का नाम कृतर्वेम
(Kritaverma)तथामाता का नाम श्याम
देवी (सुरम्य) था।आपका जन्म मघा शुक्ल
तीज को कपिलपुर में हुआ
था। मघा शुक्ल पक्ष की तीज को ही आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष
की षष्ठी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई।
आषाढ़ शुक्ल की सप्तमी के दिन श्री सम्मेद
शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-शूकर, चैत्यवृक्ष- पाटल, यक्ष-
पाताल,यक्षिणी- गांधारी।
(14) अनंतनाथजी : चौदहवें तीर्थंकर
अनंतनाथजी की माता का नाम
सर्वयशा तथा पिता का नाम सिहसेन
था।आपका जन्म अयोध्या में वैशाख कृष्ण
पक्ष की त्रयोदशी (13) के दिन हुआ। वैशाख
कृष्ण पक्ष चतुर्दशी (14) को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा कठोर तप के बाद
वैशाख कृष्ण की त्रयोदशी के दिन
ही कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल
की पंचमी के दिन
आपको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हआ।
जैन धर्मावलंबियों अनुसार उनका प्रतीक
चिह्न-सेही, चैत्यवृक्ष- पीपल, यक्ष- किन्नर,
यक्षिणी-वैरोटी है।
(15) धर्मनाथ : पंद्रहवें तीर्थंकर
श्री धर्मनाथ के पिता का नाम भानु और
माता का नाम सुव्रत था। आपका जन्म
मघा शुक्ल की तृतीया (3)को रत्नापुर में
हुआ था। मघा शुक्ल की त्रयोदशी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा पौष
की पूर्णिमा के दिन आपको कैवल्य
की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष
की पंचमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
आपका प्रतीक चिह्न- वज्र, चैत्यवृक्ष-
दधिपर्ण, यक्ष- किंपुरुष,यक्षिणी-
सोलसा।
(16) शांतिनाथ : जैन धर्म के सोलहवें
तीर्थंकर शांतिनाथ का जन्म ज्येष्ठ मास के
कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हस्तिनापुर में
इक्ष्वाकू कुल में
हुआ। शांतिनाथ के पिता हस्तिनापुर के
राजा विश्वसेन थे और माता का नाम
आर्या (अचीरा) था। आपने ज्येष्ठ माह के
कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को दीक्षा ग्रहण
की तथा पौष शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन
आपको कैवल्य की प्राप्ति हुई। ज्येष्ठ मास
के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को सम्मेद शिखर
पर
निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-
हिरण, चैत्यवृक्ष-नंदी, यक्ष- गरुढ़,
यक्षिणी-अनंतमतीहैं।
(17) कुंथुनाथजी : सत्रहवें तीर्थंकर
कुंथुनाथजी की माता का नाम
श्रीकांता देवी (श्रीदेवी) और
पिता का नाम राजा सूर्यसेन था।
आपका जन्म वैशाख कृष्ण पक्ष
की चतुर्दशी को हस्तिनापुर में
हुआ था। वैशाख कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन
दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र शुक्ल पक्ष
की पंचमी को कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई।वैशाख शुक्ल पक्ष की एकम
के दिन सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ।
जैन धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-छाग, चैत्यवृक्ष- तिलक, यक्ष- गंधर्व,
यक्षिणी-मानसी है।
(18) अरहनाथजी : अठारहवें तीर्थंकर
अरहनाथजी या अर प्रभु के पिता का नाम
सुदर्शन और माता का नाम मित्रसेन
देवी था।
आपका जन्म मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष
की दशमी के दिन ‍हस्तिनापुर में हुआ।
मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की ग्यारस
को आपने दीक्षा ग्रहण की तथा कार्तिक
कृष्ण पक्ष की बारस को कैवल्य ज्ञान
की प्राप्ति हुई।मार्गशीर्ष की दशमी के
दिन सम्मेद शिखर पर निर्वाण
की प्राप्ति हुई। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
उनका प्रतीक चिह्न-तगरकुसुम (मत्स्य),
चैत्यवृक्ष- आम्र, यक्ष- कुबेर,
यक्षिणी- महामानसी है।
(19) मल्लिनाथ : उन्नीसवें तीर्थंकर
मल्लिनाथ के पिता का नाम कुंभराज और
माता का नाम प्रभावती (रक्षिता)
था। मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष की ग्यारस
को आपका जन्म मिथिला में हुआ था।
मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष
की एकादशी को दीक्षा ग्रहण
की तथा इसी माह की तिथि को कैवल्य
की प्राप्ति भी हुई। फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की बारस को सम्मेद शिखर पर निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
आपका प्रतीक
चिह्न- कलश, चैत्यवृक्ष- कंकेली (अशोक),
यक्ष-वरुण, यक्षिणी- जया है।
(20) मुनिसुव्रतनाथ : बीसवें तीर्थंकर
मुनिसुव्रतनाथ के पिता का नाम सुमित्र
तथा माता का नाम प्रभावती था।
आपका जन्म ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की आठम
को राजगढ़ में हुआ था। फाल्गुन कृष्ण पक्ष
की बारस को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष की बारस
को ही कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई।
ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की नवमी को सम्मेद शिखर
पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-कूर्म, चैत्यवृक्ष- चंपक, यक्ष- भृकुटि,
यक्षिणी-विजया।
(21) नमिनाथ : इक्कीसवें तीर्थंकर के
पिता का नाम विजय और माता का नाम
सुभद्रा (सुभ्रदा-वप्र)था। आप स्वयं
मिथिला के राजा थे। आपका जन्म
इक्ष्वाकू कुल में श्रावण
मास के कृष्ण पक्ष
की अष्टमी को मिथिलापुरी में हुआ था।
आषाढ़ मास के शुक्ल की अष्टमी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा मार्गशीर्ष के शुक्ल
पक्ष की एकादशी को कैवल्य
की प्राप्ति हुई।वैशाख कृष्ण
की दशमी को सम्मेद शिखर पर निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
आपका प्रतीक चिह्न-उत्पल, चैत्यवृक्ष- बकुल,
यक्ष- गोमेध, यक्षिणी-अपराजिता।
(22) नेमिनाथ : बावीसवें तीर्थंकर
नेमिनाथ के पिता का नाम
राजा समुद्रविजय और माता का नाम
शिवादेवी था। आपका जन्म श्रावण मास
के कृष्ण पक्ष
की पंचमी को शौरपुरी (मथुरा) में यादववंश
में
हुआ था। शौरपुरी (मथुरा) के
यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र
समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ।
अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वासुदेव से
उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण। इस प्रकार
नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे।
श्रावण मास के कृष्ण पक्ष
की षष्ठी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष
की अमावस्या को गिरनार पर्वत पर कैवल्य
की प्राप्ति हुई। आषाढ़ शुक्ल
की अष्टमी को आपको उज्जैन या गिरनार
पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-शंख, चैत्यवृक्ष- मेषश्रृंग, यक्ष- पार्श्व,
यक्षिणी-बहुरूपिणी।
(23) पार्श्वनाथ : तेवीसवें तीर्थंकर
पार्श्वनाथ के पिता का नाम
राजा अश्वसेन तथा माता का नाम
वामा था। आपका जन्म पौष कृष्ण पक्ष
की दशमी को वाराणसी (काशी) में हुआ
था।चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आपने
दीक्षा ग्रहण की तथा चैत्र कृष्ण पक्ष
की चतुर्थी को ही कैवल्य की प्राप्ति हुई।
श्रावण शुक्ल की अष्टमी को सम्मेद शिखर
पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन
धर्मावलंबियों अनुसार आपका प्रतीक
चिह्न-सर्प, चैत्यवृक्ष- धव, यक्ष- मातंग,
यक्षिणी-कुष्माडी।
(24) महावीर : चौबीसवें तीर्थंकर भगवान
महावीर स्वामी का जन्म नाम
वर्धमान,पिता का नाम सिद्धार्थ
तथा माता का नाम त्रिशला(प्रियंक
ारिनी) था। आपका जन्म
चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी के दिन कुंडलपुर में
हुआ था। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष
की दशमी को आपने दीक्षा ग्रहण
की तथा वैशाख शुक्ल की दशमी के दिन
कैवल्य की प्राप्ति हुई। 42
वर्ष तक आपने साधक जीवन बिताया।
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष
की अमावस्या के दिन
आपको पावापुरी पर 72 वर्ष में निर्वाण
प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों अनुसार
आपका प्रतीक
चिह्न- सिंह, चैत्यवृक्ष- शाल, यक्ष- गुह्मक,
यक्षिणी- पद्मा सिद्धायिनी।

Jai jinnendra