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जैन धर्म के अनुसार रक्षा बँधन क्यों?
भगवान मुनिसुव्रत के समय की कहानी है |
उज्जैनी नगरी में राजा श्रीवर्मा राज्य करते थे |
उनके बलि,नामुचि, बृहस्पतिऔर प्रह्लाद
आदि चार मंत्री थे | उनको धर्म पे
श्रद्धा नहीं थी |
एक बार उस नगरी में 700 मुनियों के संघ
सहितआचार्य श्री अकम्पन जी का आगमन
हुआ | राजा भी उनके मंत्री के साथ गए |
राजा ने मुनि को वंदन किया, पर मुनि तो ध्यान में
लीन मौन थे | राजा उनकी शांति को देखकर बहुत
प्रभावित हुआ, पर मंत्री कहने लगे – ” महाराज !
इन जैन मुनियों को कोई ज्ञान नहीं है इसीलिए
मौन रहने का ढोंग कर रहे हैं ” |
इसप्रकार निंदा करते हुए वापिस जा रहे थे और
यह बात श्री श्रुतसागर जी नाम के मुनिश्री ने
सुन ली , उन्हें मुनि संघ की निंदा सहन नहीं हुई |
इसलिए उन्हों ने उन मंत्री के साथ वाद-विवाद
किया | मुनिराज ने उन्हें चुप कर दिया |
राजा के सामने अपमान जानकार वह मंत्री रात
में मुनि को मारने गए , पर जैसे ही उन्हों ने
तलवार उठाई उनका हाथ खड़ा ही रह गया |
सुबह सब लोगो ने देखा और राजा ने उन्हें राज्य
से बाहर कर दिया ।
ये चार मंत्री हस्तिनापुर में गए | यहाँ पद्मराय
राजा राज्य करते थे | उनके भाई मुनि थे –
उनका नाम विष्णुकुमारथा |
सिंहरथ नाम का राजा , इस हस्तिनापुर के
राजा का शत्रु था | पद्मराय राजा उसे जीत
नहीं सकता था | अंतमे बलि मंत्री की युक्ति से
उसे जीत लिया था | इसलिए राजा ने मुँह
माँगा इनाम माँगने को कहा , पर मंत्री ने कहा जब
आवश्यकता पड़ेगी तब माँग लूँगा |
इधर आचार्य श्रीअकम्पन जीआदि 700
मुनि भी विहार करते हुए हस्तिनापुर पहुँचे |
उनको देखकर मंत्री ने उन्हें मार ने
की योजना बनायीं | उन्हों राजा के पास वचन
माँग लिया |
उन्हों ने कहा – “महाराज हमें यज्ञ करना है
इसलिए आप हमें सात दिन के लिए राज्य सौप दें
| राजा ने राज्य सौप दिया फिर मंत्रियो ने
मुनिराज के चारो और पशु, हड्डी, मांस, चमड़ी के
ढेर लगा दिए फिर आग लगा दी | मुनिवरो पर घोर
उपसर्ग हुआ |
यह बात विष्णुकुमार मुनि को पता चली | वह
हस्तिनापुर गए और एक ब्राह्मण पंडित का रूप
धारण कर लिया और बलि राजा के सामने
उत्तमोत्तम श्लोक बोलने लगे |
बलि राजा पंडित से बहुत खुश हुआ और इच्छित
वर माँगने को कहा |विष्णुकुमार ने तीन पग
जमीन माँगी |
विष्णुकुमार ने विराट रूप धारण किया और एक
पग सुमेरु पर्वत पर रखा और दूसरा मानुषोतर
पर्वत पर रखा और बलि राजा से कहा – “बोल
अब तीसरा पग कहा रखूँ ? तीसरा पग रखने
की जगह दे नहीं तो तेरे सिर पर रखकर तुझे
पाताल में उतार दूँगा” | चारो और
खलबली मचगयी|
देवो और मनुष्यों ने विष्णुकुमार
मुनि को विक्रिया समेटने के लिए कहा |
चारो मंत्रियो ने भी क्षमा माँगी |
श्री विष्णुकुमार मुनि ने अहिंसा पूर्वक धर्मं
का स्वरूप समझाया | इसप्रकार विष्णुकुमार ने
700 मुनियों की रक्षा की |हजारो श्रावक ने
700 मुनियों की वैयावृति की और
बलि आदि मंत्री ने मुनिराजो से क्षमा माँगी |
जिसदिन यह घटना घटी , उसदिन श्रावण
सुदी पूर्णिमा थी | विष्णुकुमार ने 700
मुनियों का उपसर्ग दूर हुआ और
उनकी रक्षा हुई , अतः वह दिन रक्षा पर्व के
नाम से प्रसिद्ध हुआ | आज भी यह दिन
रक्षाबंधन पर्व के नाम से मनाया जाता है |
वास्तव में कर्मो से न बंधकर स्वरूप
की रक्षा करना ही ‘रक्षा-बंधन ‘ है |