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एक व्यक्ति ने सवाल किया:- मुनियों को अपनी आत्मा को शुद्ध करना है फिर शरीर को इतना कष्ट क्यों देते हैं?क्यों आजीवन वस्त्र त्याग देते हैं? गर्मी हो या भीषण सर्दी हो जमीन पर सोते है? क्यों दिन में एक समय भोजन और जल ग्रहण करते हैं, वो भी खड़े होकर अंजुरी में?
तब मुनिराज  ने जवाब दिया:-
दूध को गरम करना है तो बगैर तपेली को गर्म किए दूध गरम नहीं हो सकता। शरीर भी तो एक तपेला है, इसे गरम किये बिना आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती। ज़िन्दगी में तप जरूरी है।
इष्ट को पाना है तो कष्ट को सहना पड़ेगा ही।
कहा भी है-हीरा चमकता है घिसने के बाद,
मेहंदी रंग लाती है पिसने के बाद,
आशीर्वाद मिलता है झुकने के बाद,
पक्षी उड़ जाता है दाना चुगने के बाद,
आदमी संभालता है ठोकर लगने के बाद,
और आत्मा परमात्मा बनती है तपने के बाद।