मुझ पर केवल दाग ही लगे
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किसी ने चन्दन सा किसी ने कमल सा कहा 
सबने मेरा जिस्म देखा और मखमल सा कहा 

मैं भी इंसा हूँ औरों की तरह, मेरी भी रूह है
पहले खुद फिसले और मुझे दलदल सा कहा

जैसे पान खाते हैं और फिर खाकर थूक देते हैं 
औरत की औकात को बस एक पल सा कहा

जाने कितनों ने डुबकियाँ लगाई बिना वक्त देखे 
सब नहाए पर कहाँ किसी ने गंगाजल सा कहा

हर दौर में मुझ पर केवल दाग ही लगे ‘मधु’ 
कोई नहीं मिला जिसने मुझे उज्ज्वल सा कहा…!

Lekhak : Madhu