बेटे डोली में विदा नही होते और बात है मगर।                      

 उनके नाम का “एडमिशन लेटर”  आँगन छूटने         

का पैगाम लाता है
जाने की तारीखों के नज़दीक आते आते

मन बेटे का चुपचाप रोता है 
 अपने कमरे की दीवारें देख देख

घर की आखरी रात नही सोता है
होश सम्हालते सम्हालते घर की जिम्मेदारियां सम्हालने लगता है

विदाई की सोच बैचेनियों का समंदर हिलोरता है 
 शहर, गलियाँ , घर छूटने का दर्द समेटे

सूटकेस में किताबें और कपड़े सहेजता है 

अपनी बाइक , बैट , कमरे के अजीज पोस्टर 

छोड़ आँसू छिपाता मुस्कुराता निकलता है ………
बेपरवाही का इल्ज़ाम किसी पर नही अब

झिड़कियाँ सुनता देर तक कोई नही सोता है
 वीरान कर गया घर का कोना कोना

जाते हुए बेटी सा सीने से नही लगता है 
एयरपोर्ट पर पनीली आंखों से मुस्कुराता है

नजरें चुराता हुआ मम्मा को हाथ हिलाता ह

फिक्र करता माँ की, मगर बताना नही आता है

कर देते है “आन लाइन” घर के काम दूसरे शहरों से और जताना नही आता है

बड़ी से बड़ी मुश्किल छिपाना आता है 

माँ से फोन पर पिता की खबर पूछते 

और पापा से क्या पूछना सूझ नही पाता है 
लापरवाह, बेतरतीब लगते है बेटे

मजबूरियों में बंधा दूर रहकर भी जिम्मेदारियां निभाना आता है
 पहुँच कर अजनबी शहर में पढ़ाई के लिये

दिल बच्चा बना माँ के आँचल में बाँध जाता है
ये बात और है बेटे डोली में विदा नही होते मगर…

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